एक हफ्ते की डायरी सट्टा मटका देखने वाले के घर की
एक हफ्ते की डायरी सट्टा मटका देखने वाले के घर की
ये लेख नियम नहीं गिनाता। ये एक हफ्ता लिखता है। नाम काल्पनिक हैं, दिन आम हैं। जो घर में ये शब्द घूमते हैं, उनको दृश्य पहचान में आ जाएँगे। जो बाहर से आ रहे हैं, उनको भाषा धीरे धीरे खुलनी चाहिए। जुआ सिखाना मकसद नहीं। मकसद ये दिखाना है कि पेज बंद होने के बाद घर में क्या चलता रहता है।
सोमवार
सुबह साढ़े आठ। चाय ठंडी पड़ने से पहले फोन गर्म हो जाता है। आदमी कहता है बस तारीख देखनी है। तारीख के साथ अंक आ जाते हैं। अंक के साथ एक ग्रुप की घंटी। घंटी के साथ दोस्त का संदेश, आज कैसा लग रहा है। लग रहा है वाला वाक्य सोमवार को सबसे सीधा लगता है क्योंकि हफ्ता नया है, जेब भी नए वेतन जैसी लगती है, भले वेतन अभी दूर हो।
रसोई में आवाज आती है। बच्चे को टiffin चाहिए। आदमी सुनता है, जवाब आधा देता है। आधा इसलिए कि स्क्रीन पर एक पंक्ति अधूरी है। पंक्ति पूरी होते ही टiffin भी पूरा हो जाता है, बस दो मिनट की बात थी। दो मिनट घर में छोटे लगते हैं। बस में वही दो मिनट याद नहीं रहते। याद रहता है कि सुबह झगड़ा जैसा कुछ हुआ, कारण याद नहीं।
दफ्तर पहुँचकर वो खोज करता है। हिंदी में कभी सट्टा मटका, अंग्रेजी में वही चीज लोग Satta Matka लिख देते हैं। दोनों खोज एक जैसी साइटें निकालती हैं। वो एक खोलता है, दूसरी से मिलाता है, तीसरी पर विज्ञापन देखकर वापस आता है। काम की फाइल उसी खिड़की के पीछे दबी रहती है। साथ वाला पूछता है रिपोर्ट कहाँ तक आई। जवाब आता है लगभग। लगभग का मतलब अभी पेज बंद नहीं हुआ।
दोपहर का खाना जल्दी निपटता है। निपटाने की जल्दी भूख से नहीं, समय से है। सट्टा मटका कल्याण का नाम दोपहर बाद दिमाग में गूमना शुरू करता है, भले घोषणा शाम की हो। इंतजार दोपहर से शुरू होना सोमवार की पहचान है। हफ्ते का पहला इंतजार सबसे लंबा लगता है।
शाम घर आकर वो चुप रहता है। चुप रहना थकान कही जाती है। थकान आधी सच्ची है। आधी ये है कि ग्रुप में बहस चल रही है, दो अंक अलग हैं, कौन सही है ये तय नहीं। तय करने में खाना ठंडा होता है। ठंडा खाना सोमवार को माफ हो जाता है। माफी हफ्ते भर नहीं चलनी चाहिए, लेकिन चलती है।
रात को वो कॉपी निकालता है। सोमवार का पन्ना खाली रहता है अक्सर, क्योंकि हफ्ता अभी नैतिक लगता है। खाली पन्ना सुकून देता है। सुकून इस बात पर कि आज नहीं लगाया। न लगाने को जीत मान लेना सोमवार की छोटी चाल है। चाल घर को दिखाई नहीं देती। दिखती है सिर्फ ये कि फोन देर रात तक चमकता रहा।
मंगलवार
मंगलवार को आदत चेहरा बदलती है। अब तारीख काफी नहीं। अब पुराना चार्ट चाहिए। पुराना चार्ट संग्रह है, ये बात वो जानता है, फिर भी रंग की पेंसिल निकालता है। तीन दिन एक जैसे लगे तो दिमाग कहता है नियम आ गया। चौथा दिन तोड़े तो दिमाग कहता है अपवाद था। दोनों वाक्य एक ही कॉपी में रहते हैं। कॉपी ईमानदार है, पढ़ने वाला नहीं।
पत्नी पूछती है बार बार वही पेज क्यों। जवाब आता है जानकारी चाहिए। जानकारी शब्द भारी है, इसलिए सवाल रुक जाता है। जानकारी का वजन असल में इतना नहीं होता। वजन इंतजार का होता है। इंतजार को जानकारी कह दो तो झगड़ा टल जाता है। टला झगड़ा हल नहीं होता। मंगलवार को घर ऐसे ही कई वाक्य टालता है।
दफ्तर में एक सहकर्मी पास आकर फुसफुसाता है, कल का क्या रहा। फुसफुसाहट से बात गुप्त लगती है, इसलिए आकर्षक। आकर्षक बात दो मिनट की छुट्टी मांगती है। छुट्टी दो मिनट की नहीं रहती। तीन पेज खुलते हैं, एक लिंक बचता है, लिंक पर उंगली रुकती है। रुकना खतरनाक जगह है। मंगलवार को वो अभी नहीं दबाने का फैसला करता है। फैसला सुंदर लगता है। सुंदर फैसले अक्सर शाम तक कमजोर पड़ते हैं।
शाम को घोषणा लेट दिखती है। लेट का गुस्सा गाड़ी लेट होने जैसा है। गुस्सा अंक पर नहीं, टूटी लय पर है। लय टूटे तो आदमी और साइटें खोलता है। दस साइट खोलने से सच नहीं बढ़ता, तुलना बढ़ती है। तुलना में एक गलत कॉपी चिपक जाए तो रात खराब। मंगलवार की रात इसी तुलना में निकलती है। नींद आती है, आती है कम।
सोने से पहले वो खुद से कहता है कल कम देखूँगा। वादा हवा में रहता है। हवा मंगलवार से बुधवार तक यात्रा करती है और रास्ते में हल्की हो जाती है।
बुधवार
बुधवार को जेब पहली बार साफ बोलती है। छोटे नोट कम पड़ते हैं। आदमी कहता है चाय ज्यादा हो गई। चाय का हिसाब आधा सच है। आधा और जगह गया। जगह का नाम घर में नहीं लिया जाता। नाम न लिया जाए तो कमी किराने पर गिरती है। किराना महँगा हो गया, ये वाक्य आसान है। आसान वाक्य बुधवार की ढाल है।
दोपहर में एक संदेश आता है। मुफ्त चार्ट, तेज अपडेट, अभी खोलो। भाषा नरम है। नरम भाषा में बटन छिपे होते हैं। वो बटन नहीं दबाता, स्क्रीनशॉट रख लेता है। रखना भी एक रिश्ता है। रिश्ता बाद में खोलने का बहाना बनता है। बहाना बुधवार को छोटा लगता है। शुक्रवार को वही बहाना दरवाजा बन जाता है।
घर में बच्चा स्कूल से शब्द लेकर आता है। आज खुला क्या, हँसकर कहता है, क्योंकि घर में यही वाक्य घूमता है। हँसी ठंडी पड़ जाती है। बड़े एक दूसरे का मुँह देखते हैं। शब्द बच्चों की हवा में बैठ जाएँ तो बाद में खोज बनते हैं। बुधवार को ये बात दिमाग में आती है और दब जाती है, क्योंकि शाम का समय नजदीक है। नजदीक समय बड़ी बातों को पीछे धकेल देता है।
रात का खाना टेबल पर है, फोन भी। फोन जीतता है। खाना दूसरी बार गरम होता है। दूसरी बार गरम होना छोटी शिकायत है। शिकायत का ढेर जब हफ्ते के अंत में गिरता है, तब लोग पूछते हैं अचानक क्या हुआ। अचानक कुछ नहीं हुआ। बुधवार हुआ था।
सोते समय वो हिसाब जोड़ता है और जोड़ गलत निकालता है। गलत जोड़ राहत देता है। राहत चाहिए होती है, इसलिए जोड़ दोबारा नहीं किया जाता। न करना भी एक फैसला है, भले नाम न दिया जाए।
गुरुवार
गुरुवार को दोस्त मिलते हैं। चाय की दुकान, दो कुर्सियाँ, तीन राय। एक कहता है आज ऐसा आएगा। दूसरा कहता है कल वाला पैटर्न टूटा। तीसरा चुप रहता है क्योंकि उसका महीना पहले खराब हो चुका है। चुप आदमी सबसे काम की चीज कह रहा होता है, बिना बोले। बोलने वाले ज्यादा सुने जाते हैं।
दुकान पर हँसी चलती है। हँसी आदत को हल्की दिखाती है। हल्की लगे तो रोक की जरूरत नहीं लगती। गुरुवार की हँसी इसी काम आती है। घर लौटकर वही हँसी गायब रहती है। घर में चेहरा भारी होता है। भारी चेहरा थकान कहा जाता है। नाम फिर गलत पड़ता है।
दफ्तर में रिपोर्ट अधूरी रहती है। अधूरी रिपोर्ट पर सवाल आता है। सवाल से शर्म आती है। शर्म से और पेज खुलता है, क्योंकि पेज शर्म नहीं पूछता। पेज सिर्फ समय मांगता है। समय देना आसान लगता है, जवाब देना कठिन। गुरुवार को कठिन काम टलता है, आसान काम चलता है। आसान काम चार्ट है।
शाम को पत्नी साफ पूछती है, इस हफ्ते कितना गया। सवाल सीधा है, जवाब घूमता है। घूमते जवाब से विश्वास नहीं टूटता एक दिन में। विश्वास पतला पड़ता है। पतला विश्वास गुरुवार की रात खाना कम करता है, बात कम करता है, दूरी बढ़ाता है। दूरी को लोग व्यस्तता कहते हैं। व्यस्तता सुविधाजनक शब्द है।
रात को वो ग्रुप से एक बार निकलता है, फिर वापस घुसता है। निकलना नाटक है। नाटक खुद को दिखाने के लिए होता है कि काबू है। काबू होता तो वापस घुसने की जरूरत न पड़ती। गुरुवार ये बात सिखाता है, और सबक सोने तक भूल जाता है।
शुक्रवार
शुक्रवार को जेब और दिमाग दोनों ढीले पड़ते हैं। हफ्ते का अंत पास है, लोग कहते हैं कल संभाल लेंगे। कल संभालना शुक्रवार की सबसे महंगी पंक्ति है। पंक्ति सुंदर है इसलिए दोहराई जाती है। दोहराव से सच्चाई नहीं आती, हिम्मत आती है गलत दिशा में।
दोपहर में लिंक फिर आता है। पहले जो स्क्रीनशॉट रखा था, वही बहाना बनता है। वो पेज खोलता है। चार्ट ऊपर है, बटन नीचे। चार्ट देखना था, उंगली नीचे जाती है। नीचे जाना दुर्घटना लगता है। दुर्घटना अक्सर डिजाइन होती है। शुक्रवार को डिजाइन जीतता है या नहीं, ये घर बाद में बताएगा। आज वो कहता है बस देखा। देखा वाला वाक्य सोमवार से चला आ रहा है। शब्द वही है, वजन बढ़ चुका है।
शाम घर में मेहमान हैं। मेहमान के सामने फोन जेब में रहना चाहिए। रहता नहीं। एक बार जाँच, दूसरी बार बहाना, बाथरूम। बाथरूम की रोशनी में अंक छोटे लगते हैं, गलती का खतरा बढ़ता है। गलती हो तो गुस्सा मेहमान पर नहीं, खुद पर आता है, निकलता किसी और पर है। शुक्रवार की रात घर में हँसी अधूरी रहती है। अधूरी हँसी मेहमान भी भाँप लेते हैं, नाम नहीं लेते।
रात देर तक ग्रुप चलता है। जीत की एक तस्वीर घूमती है। तस्वीर शाबाशी मांगती है। शाबाशी सस्ती है। चुप बैठे लोग अगली कोशिश सोचते हैं। वो भी सोचता है। सोचना योजना नहीं होना चाहिए, बन जाती है। योजना का मतलब अक्सर ये होता है कि कल संयम से देखूँगा। संयम शब्द शुक्रवार की रात सबसे ज्यादा बोला जाता है, और सबसे कम चलेगा।
सोने से पहले वो पासबुक नहीं खोलता। न खोलना राहत है। राहत का बिल रविवार को आता है। शुक्रवार ये जानता है और जानकर भी सो जाता है। जानना और मानना अलग हैं। शुक्रवार मानने से बचता है।
शनिवार
शनिवार को समय ज्यादा है, इसलिए नुकसान का समय भी ज्यादा है। छुट्टी चार्ट के लिए अच्छी मिट्टी है। मिट्टी में इंतजार लंबा उगता है। लंबा इंतजार छोटे फैसलों की कतार लगा देता है। कतार में एक फैसला साफ नहीं रहता। नहीं रहता तो आदमी कहता है हफ्ता खराब गया, एक दिन नहीं।
सुबह देर तक लेटे लेटे पेज खुलता है। बिस्तर और स्क्रीन एक हो जाएँ तो दिन की शुरुआत पहले ही बिक चुकी होती है। चाय बाद में आती है। बच्चे पूछते हैं पार्क चलना है क्या। जवाब आता है बाद में। बाद में अक्सर नहीं आता। शनिवार का बाद में दोपहर बनता है, दोपहर शाम, शाम थकान। थकान का दोष धूप पर गिरता है। धूप निर्दोष है।
दोपहर परिवार के साथ बाजार जाने का प्लान था। प्लान अधूरा रहता है क्योंकि एक समय याद आ जाता है। समय याद आना घड़ी का काम है, परिवार का नहीं। परिवार इंतजार करता है फोन के बाहर। फोन के अंदर भीड़ है। भीड़ जीतती है। बाजार की सब्जी अधूरी आती है। अधूरी सब्जी छोटी बात है। छोटी बातों का ढेर शनिवार शाम दिखाई देने लगता है।
शाम को वो खुद को दिलासा देता है कि रविवार नया हिसाब होगा। नया हिसाब पुरानी आदत पर टिका हो तो नया नहीं रहता। दिलासा सस्ता है। सस्ता दिलासा शनिवार को नींद भी दे देता है। नींद आना इलाज नहीं। नींद टालना है।
रात को पत्नी अलग सोने की बात नहीं करती, सिर्फ कम बोलती है। कम बोलना शोर से साफ संकेत है। संकेत पढ़ा नहीं जाता। न पढ़ना शनिवार की आखिरी गलती है, और ये गलती चार्ट पर नहीं लिखी जाती।
रविवार
रविवार को आईना साफ होता है अगर कोई हिसाब निकाले। ज्यादातर लोग निकालते नहीं। निकालें तो हफ्ते की कहानी कुछ ऐसी बैठती है। सोमवार पर दर्शक वाला सुख। मंगलवार पर रंग और नियम का भ्रम। बुधवार पर जेब की पहली शिकायत। गुरुवार पर हँसी और पतला विश्वास। शुक्रवार पर ढीला फैसला। शनिवार पर लंबा इंतजार। रविवार पर थकान, जिसे आराम कहा जाता है।
सुबह वो चाय लेकर बैठता है और कहता है इस हफ्ते ज्यादा कुछ नहीं हुआ। वाक्य तभी तक चलता है जब तक कागज न निकले। कागज निकले तो दो हजार यहाँ, समय वहाँ, नींद वहाँ, एक अधूरी रिपोर्ट वहाँ। जोड़ सुंदर नहीं निकलता। न सुंदर निकलना रविवार की सच्चाई है। सच्चाई से भागने का तरीका नया चार्ट खोलना है। बहुत से घर यही चुनते हैं। चुनना पुरानी आदत है, नया हफ्ता नहीं।
कुछ रविवार ऐसा भी होता है जब आदमी ग्रुप छोड़ता है। छोड़ना साफ काम है। साफ काम तीन दिन चल सकता है। चौथे दिन कोई तस्वीर भेज दे तो हाथ फिर जाए। इसलिए रविवार का संकल्प अकेला काफी नहीं। संकल्प के साथ निशान हटाने पड़ते हैं, घंटी बंद करनी पड़ती है, एक इंसान को बताना पड़ता है। बिना बताए संकल्प हवा है। हवा सोमवार तक यात्रा करती है और खो जाती है।
घर अगर बात करे तो रविवार सबसे अच्छा दिन है। समय है, भीड़ कम है, हफ्ते का सबूत ताजा है। बात छोटे सवालों से शुरू हो सकती है। देखते हो या लगाते हो। कितना गया। उधार है क्या। नींद कैसी है। चार सवाल। भाषण बाद में। भाषण से शर्म बढ़ती है। शर्म से झूठ। झूठ से अगला सोमवार पहले जैसा रह जाता है।
रविवार रात को फोन एक तरफ रखना संभव है। संभव का मतलब आसान नहीं। मतलब ये कि दुनिया बिना अंक के भी चलती है। चलती दुनिया सबसे सादा सबक है, और सबसे कम सुना जाता है। सुना जाए तो डायरी यहीं रुक सकती है। न सुना जाए तो सोमवार फिर वही वाक्य लाएगा। बस तारीख देखनी है। तारीख के साथ फिर सब कुछ आ जाएगा।
डायरी के किनारे की टिप्पणी
सात दिन लिखने का मतलब ये नहीं कि हर घर ऐसा ही काटे। मतलब ये है कि आदत दिन में छिपती है, हफ्ते में दिखाई देती है। एक दिन को लोग प्रयोग कहते हैं। सात दिन को कहानी कहना पड़ता है। कहानी से भागना हो तो पेज रोज बदलो। कहानी देखनी हो तो एक ही कॉपी में तारीख लिखो, इच्छा अलग पन्ने पर। दोनों पन्ने मिल गए तो आंख धोखा खाएगी।
कानून वाली बात इस डायरी में कम इसलिए है क्योंकि घर वाले पहले कानून नहीं पूछते। पहले पूछते हैं ये चुप्पी क्यों है, ये तंगी क्यों है, ये फोन क्यों नहीं छूटता। जवाब अगर सिर्फ बाजार के शब्द हों तो घर समझ नहीं पाता। घर को दिन चाहिए, शब्द नहीं। इसलिए ये लेख दिन देता है। शब्द पहले के लेखों में हैं।
जो पाठक ये हफ्ता पढ़कर सिर्फ मनोरंजन ले, वो भी ठीक है। जो अपने घर का चेहरा देख ले, उसे सूची नहीं चाहिए, एक फैसला चाहिए। फैसला छोटा हो। ग्रुप से निकलना। रात दस बजे के बाद पेज न खोलना। उधार न लेना। तीन में से एक भी चले तो अगली डायरी अलग लिखी जाएगी। न चले तो शब्द बदल जाएँगे, हफ्ता नहीं।
अंत में वही जाँच काफी है जो पहले लेखों में थी। पेज बंद करने के बाद मन हल्का है या बेचैन। हल्का हो तो जानकारी थी। बेचैन हो तो कीमत चल रही है। कीमत को हफ्ते के नाम दो, दिन के नहीं। दिन बचाव देता है। हफ्ता हिसाब मांगता है। हिसाब मांगना प्रेम के खिलाफ नहीं। हिसाब से सोमवार थोड़ा साफ लौट सकता है। साफ सोमवार बड़ी चीज है। बड़ी चीज चार्ट पर नहीं छपती। छपती है घर की सुबह में, जब चाय ठंडी होने से पहले फोन जेब में रह जाए।